IIT to IAS journey: आईएएस अधिकारी अरुणराज से प्रेरणा लेनी चाहिए, जिन्होंने बिना कोचिंग के फर्स्ट अटेम्प्ट में ही यूपीएससी एग्जाम पास कर लिया। कई उम्मीदवार यूपीएससी की तैयारी के लिए कोचिंग करते हैं, लेकिन अरुणराज को अपनी सेल्फ स्टडी पर भरोसा था। अरुणराज बचपन से ही पढ़ाई में अच्छे थे।
अरुण बचपन से ही पढ़ाई में बहुत अच्छे थे और उनके तकरीबन हर क्लास में ही बढ़िया नंबर आते थे। उनकी पढ़ाई सीबीएसई बोर्ड से हुयी और उन्होंने दसवीं में 94.8 और बारहवीं में 91.6 प्रतिशत अंकों के साथ परीक्षा पास की। इसके बाद उन्होंने कठिन माने जाने वाले आईआईटी जेईई एग्जाम को भी पास कर लिया। अरुण को आईआईटी कानपुर मिला। यहां से ग्रेजुएशन करते समय ही अरुण तय कर चुके थे कि उन्हें यूपीएससी परीक्षा ही पास करनी है।

इसी दौरान उन्होंने अपने सपने को साकार करने के लिए यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी।
अरुणराज आईआईटी लास्ट ईयर में एक साथ दो परीक्षा की तैयारी करने लगे। पहला आईआईटी और दूसरा यूपीएससी। उन्होंने दोनों परीक्षा की पढ़ाई करने के लिए अपने घंटों को अलग-अलग बांट दिया। उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी नहीं करने का फैसला किया और वे अपनी सच्ची लगन एवं मेहनत से सिर्फ यूपीएससी के लिए सेल्फ स्टडी करने लगे। उन्होंने ज्यादा से ज्यादा एनसीईआरटी की किताबों को अध्ययन किया और ऑनलाइन उपलब्ध संसाधनों को उपयोग किया। साथ ही उन्होंने ऑनलाइन ही कई मॉक साक्षात्कारों में भाग लिया।

अरुणराज की महेनत रंग लाई और उनका पहला ही प्रयास में यूपीएससी क्लियर हो गया। वे सिर्फ 22 साल की उम्र में आईएएस अधिकारी बन गए। यूपीएससी की ऑल इंडिया रैंक (AIR) में उन्हें 34 रैंक मिला था। इस वक्त उनकी नियुक्त तमिलनाडु में है। अरुणराज ने कभी भी कोचिंग नहीं की और उन्हें अपनी मेहनत पर विश्वास था। उन्होंने सिर्फ सेल्फ स्टेडी से ही यह सफलता हासिल की है।
क्यों चुना आईएएस ऑफिसर बनना?
एक साक्षात्कार में यूपीएससी चुनने के पीछे का कारण बताते हुए अरुण कहते हैं कि आजकल की ज्यादातर नौकरियां ऐसी होती हैं जिन्हें पाने के बाद भी आपके जीवन से संघर्ष और कांपटीशन खत्म नहीं होता। इन नौकरियों में सर्वाइव करने के लिए आपको जिंदगी भर रैट-रेस में भागना होता है वरना आप पीछे छूट जाते हैं। अरुण इस दौड़ में उम्रभर के लिए नहीं पड़ना चाहते थे।
उन्हें आईएएस तुलनात्मक स्टेबल जॉब लगी, जिसे पाना कठिन है पर एक बार उस मुकाम तक पहुंच जाने के बाद बार-बार खुद को साबित करने और कांपटीशन में बने रहने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके साथ ही वे भारत में रहकर अपनी शर्तों पर काम करना चाहते थे। इन्हीं विचारों ने अरुण को सिविल सर्विसेस का चुनाव करने के लिए प्रेरित किया।

अरूण की एडवाइस
अरुण दूसरे कैंडिडेट्स को यही सलाह देते हैं कि जितने भी घंटे पढ़ो, कांसन्ट्रेट होकर पढ़ो और रोज़ पढ़ो। एक विषय को उठाओ तो टारगेट बनाकर उसके जितने टॉपिक्स सोचे, उतने खत्म करके ही उठो।
शेड्यूल को लेकर रिजिड रहो पर चूंकि इंसानों को मूड स्विंग होता ही है तो ऐसे मौकों पर अगर दिल न लगे तो पढ़ाई से ब्रेक लो, जबरदस्ती किताबें खोलकर न बैठे रहो। कई बार स्टूडेंट्स एक-दो बार में सेलेक्ट नहीं होते, ऐसे में हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।



