'7 लाख छात्र, सिर्फ 30 हजार हॉस्टल सीटें', सत्य निकेतन हादसे पर सोनू सूद ने सरकार को दी सलाह
सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे के बाद सोनू सूद ने छात्रों की सुरक्षा और सरकारी हॉस्टल की कमी पर चिंता जताई। उन्होंने सरकार से बढ़ती छात्र संख्या के मुकाबले हॉस्टल सुविधाएं बढ़ाने की अपील की।
सत्य निकेतन हादसे के बाद सोनू सूद ने उठाया छात्रों की सुरक्षा का मुद्दा
दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला पीजी इमारत गिरने की दर्दनाक घटना ने छात्रों की सुरक्षा और किफायती आवास व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 6 सितंबर को हुए इस हादसे में 7 लोगों की मौत हुई, जबकि 12 लोगों को रेस्क्यू किया गया। घटना के बाद निर्माण मानकों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
इसी बीच अभिनेता ने सोशल मीडिया पर छात्रों के सुरक्षित आवास का मुद्दा उठाते हुए सरकार और विश्वविद्यालयों के सामने एक अहम सुझाव रखा है। सोनू सूद ने बताया कि दिल्ली में करीब 7 लाख छात्र पढ़ते हैं, लेकिन हॉस्टल की क्षमता महज 30 हजार सीटों के आसपास है। यानी करीब 31 छात्रों में से सिर्फ एक छात्र को हॉस्टल की सुविधा मिल पाती है।
सोनू सूद का सवाल—क्या छात्रों को सुरक्षित घर मिल रहा है?
सोनू सूद ने कहा कि हर साल लाखों युवा पढ़ाई और अपने सपनों को पूरा करने के लिए घर से दूर दूसरे शहरों में जाते हैं। ऐसे में सिर्फ शिक्षा की व्यवस्था करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके रहने के लिए सुरक्षित और किफायती जगह उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
सोनू सूद का संदेश: “हर साल लाखों छात्र अपने सपनों के लिए दूसरे शहर जाते हैं। लेकिन क्या हम उन्हें रहने के लिए सुरक्षित जगह दे रहे हैं?”
सरकारी जमीन पर बनें सुरक्षित हॉस्टल
सोनू सूद ने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों के आसपास खाली पड़ी सरकारी जमीन की पहचान कर वहां सुरक्षित और किफायती छात्रावास बनाए जा सकते हैं। साथ ही विश्वविद्यालयों को कैंपस के भीतर अतिरिक्त हॉस्टल और आवासीय इमारतें बनाने की अनुमति देने की बात भी उन्होंने कही।
छात्रों की सुरक्षा, माता-पिता को सुकून
अभिनेता के मुताबिक ऐसी व्यवस्था से छात्रों को सुरक्षित रहने की जगह मिलेगी, माता-पिता को मानसिक शांति मिलेगी और विश्वविद्यालयों व सरकारों के लिए राजस्व का स्रोत भी तैयार हो सकता है। उनका कहना है कि नीति में छोटा बदलाव भी किसी की जिंदगी और उसके बड़े सपने को बचा सकता है।
सत्य निकेतन हादसे ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि बड़े शहरों में पढ़ने आने वाले छात्रों के लिए सुरक्षित, सस्ता और नियमन के तहत आवास उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस कदम कब उठाए जाएंगे।